कुछ दिन पहले एक अखबार में कहीं दिखा LIFE OK पर एक सीरियल आने वाला
है, ‘एक थी सुधा, एक था चंदर’. पता नहीं क्यों पर जब भी सुधा सुनता हूँ तो एक ही
ध्यान आता है. “धर्मवीर भारती” की सुधा, उनके “गुनाहों का देवता” की. ऐसा नहीं की इससे पहले
कभी “सुधा” नहीं सुना पर ये सुधा तो एक कल्पना है जिसको feel ही किया जा सकता है. रात
को अचानक से नींद टूटी तो फिर मन किया की देखे इस LIFE OK की सुधा को, रात को हीं कोई
एप्लीकेशन था डाउनलोड किया और देखा पर वो सुधा नहीं दिखी जो “गुनाहों का देवता” के
धर्मवीर भारती की थी, ये तो कोई और है जो नाटक कर रही है, आज कल के डायरेक्टर और
एक्टर केवल आज कल के राइटर की ही भावना को
दिखा सकते हैं उनके इस नाटक में वो उन्सियत नहीं आयेगी जो सुधा और चंदर के बीच में
थी. जिसको सिर्फ और सिर्फ उस किताब को पढ़ के feel कर सकते हैं. यहाँ तो अजीब सा
नाटक लगता है इसको देख कर गुस्सा भी आता है.
कभी किसी कहानी को अपने से नहीं बदलना चाहिए उसमे अपनी कोई अलग से भावना नहीं
डालनी चाहिए नहीं तो उसकी सुधा बदल जाती है, नहीं नहीं मर जाती है.
सुधा, चंदर, बिनती, पम्मी सब अचानक से याद आने लगे : -
आज से करीब 10 साल पहले एक किताब उठाई थी ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ “सिवान”
की लाइब्रेरी से, नाम ही कुछ अजीब सा लगा “गुनाहों का देवता”, भला कोई गुनाह कर के
देवता कैसे बन जाता है? ये मेरे जीवन की पहली किताब थी इससे पहले कभी भी हिंदी
लिटरेचर को नहीं पढ़ा था. सच कहूं तो जिस दिन लिया और जिस पल से पढना शुरू किया उसके बाद रुका नहीं 14
घंटे तक लगातार पढता रहा. बीच में खाना पीना सब कुछ छुट गया.
चंदर तो सुधा के लिए देवता हीं था और उसने तो केवल गुनाह ही किया सुधा के लिए
वो सुधा ही थी जो चंदर के चरित्र को बांधे हुए थी, सुधा को उसके
गुनाहों की सजा क्यों मिली?
“कैफ बरदोस बादलों को यूं न
देख
बेखबर तू न कुचल जाये कहीं” गेसू ने सुधा को कहा था और वाकई सुधा कुचल
ही जाती है नियति के हाथों
“या मुरली मुरलीधर की अधरा न धरी अधरा न धरौंगी” ये बिनती ने बोला था
सुधा को चिढाते हुए.
सुधा का चंदर के मैडल को अपने वक्ष पे लगा कर उसको चूम लेना और चंदर
का मौका न चूकना ये कह के ‘बस कर दिया न गन्दा उसे’
सुधा की शादी से लेकर उसके मरने तक और चंदर का सुधा की हीं छोटी बहन
बिनती के माथे पे राख लगा शादी करना
सब कुछ याद आने लगा अचानक से, 10 साल से उपर हो गये हैं पर ऐसा लगता है
की कल ही की बात है.
फिर से पढने का दिल करता है पर अब नहीं हिम्मत होती है, बिनती के उस
टीचर का हाल हो गया है जो कविता को पढने के साथ साथ उसमे खो जाता है व्यथित हो के
इधर-उधर टहलने लगता है. मुझे भी मन करता है की कहानी में घुस के सब कुछ बदल दूं.