'आप' का आना और तूफान की तरह चले जाना कहीं न कहीं ये जाहिर कर रहा है की राजनीति में भी अनुभव की बड़ी जरूरत होती है। अरविन्द केजरीवाल के उपर आज कल बहूत सारे विडियो आ गए हैं और इन सब में अरविन्द की खांसी और मफलर का खासा इस्तमाल हुआ है। जल्दबाजी में कहीं अरविन्द ज्यादा तो नहीं न बोल गए जो वो पूरे नहीं कर सकते थे और उनका दंभ भरा अंदाज आज उनकी पॉपुलैरिटी को कम कर रहा है।
धरना दे कर पता नहीं क्या मिल गया? उल्टा इससे लोगों को परेशानी उठानी पड़ी खैर धरना दिए पर खुद को सही साबित न कर पाए की क्यों धरना दिए। उनके अंदाज ये बयां कर रहे थे की वो होम मिनिस्टर से अपने अहं को लड़ा रहे हैं। हालाँकि ये तो साफ़ ही था की अरविन्द की झाड़ू ज्यादा देर नहीं चलने वाली थी पर बहुत पहले ही झर गयी। अरविन्द के अहंकार भरे शब्द उनके इमेज को धुधला कर रहे हैं। लोगों ने उनपर बहूत भरोसा किया है अगर ये भरोसा टुटा तो फिर उनके लिए मुश्किलें पैदा हो जाएँगी। अगर राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करना है 'आप' को तो खुद में अनुशासन लाना होगा।
ये लोग तो खुद में ही लड़ रहे हैं। आपस में ही थप्पड़ मार रहे हैं तो भ्रस्टाचार को मारने में कैसे सफल होंगे।
अभी समय है आत्म मंथन का और धर्य का क्यूंकि तूफ़ान अगर बहूत कम देर के लिए रहेगा तो उसे लोग आंधी समझ भुला देंगे।
Monday, 24 February 2014
'आप' का क्या होगा जनाबेआली!
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