Saturday, 3 December 2011

समझदार

बहुत दिनों के बाद अचानक मन में आया की पहले जिस तरह से मन में आस्था और श्रद्धा थी वो अब नहीं महसूस होती है | ऐसा क्यों हुआ?
मुझे याद है जब मै बहुत बड़ा तो नहीं पर शायद दूसरी या तीसरी कक्षा में था, तब का ये अनुभव है, मेरे घर के पास में ही प्रभु श्रीराम की पूजा होती आई है, उस समय भगवान की मूर्ति में चमक दीखता था मानो की सही में प्रभु राम खड़े हैं, अब नहीं दीखता है शायद हम ही पापी हो गये हैं या समाज की समझदारी को समझ समझ के समझ दार हो गए हैं की अब मूर्ति, मूर्ति  दिखती है, शायद प्रभु भी बच्चो को ही खुद के होने एहसास कराते हैं. कुछ स्पिरिचुअल-स्पिरिचुअल सा लग रहा है..

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